रायपुर। CG NEWS : छत्तीसगढ़ के शत-प्रतिशत अनुदान प्राप्त अशासकीय महाविद्यालयों के सेवानिवृत्त प्राध्यापकों एवं कर्मचारियों की पेंशन और ग्रेच्युटी को लेकर विवाद गहरा गया है। छत्तीसगढ़ अनुदानित अशासकीय महाविद्यालयीन पेंशनभोगी प्राध्यापक संघ ने 18 सितंबर को प्रेस वार्ता कर राज्य सरकार के हालिया निर्णय का विरोध किया और पेंशन व्यवस्था बहाल करने की मांग की।
CG NEWS : संघ का दावा है कि 400 से अधिक सेवानिवृत्त प्राध्यापक, तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी प्रभावित हुए हैं। संघ के अनुसार, 1 सितंबर 2026 के आदेश के बाद पहले से मिल रहे पेंशन एवं ग्रेच्युटी संबंधी लाभों पर रोक लगाई गई है। मीडिया रिपोर्टों में भी उच्च शिक्षा विभाग के 2010 के आदेश को निरस्त किए जाने और उससे जुड़े पेंशन-ग्रेच्युटी लाभ समाप्त किए जाने की जानकारी सामने आई है।
2010 से चली आ रही व्यवस्था पर रोक का दावा
संघ के अनुसार, 26 अक्टूबर 2010 को तत्कालीन सरकार ने अनुदानित अशासकीय महाविद्यालयों के प्राध्यापकों एवं कर्मचारियों के लिए पांचवें वेतनमान के आधार पर पेंशन तथा चौथे वेतनमान के आधार पर ग्रेच्युटी का प्रावधान किया था।
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अब सरकार द्वारा इस व्यवस्था को समाप्त किए जाने से सेवानिवृत्त कर्मचारियों में नाराजगी है। उपलब्ध सरकारी बजट दस्तावेज में ‘अनुदान प्राप्त महाविद्यालय पेंशन योजना’ के लिए वर्ष 2026-27 में 14 करोड़ का प्रावधान भी दर्ज है।
वेतनमान के अनुरूप पेंशन को लेकर लंबी कानूनी लड़ाई
CG NEWS : संघ का कहना है कि 80 से अधिक सेवानिवृत्त प्राध्यापकों ने अलग-अलग मामलों में उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। संघ के अनुसार, इन मामलों में प्राध्यापकों ने जिस वेतनमान में सेवानिवृत्ति ली, उसी के अनुरूप पेंशन और ग्रेच्युटी दिए जाने की मांग की।
संघ का दावा है कि कुछ मामलों में उच्च न्यायालय से उनके पक्ष में आदेश भी आए और राज्य सरकार की ओर से दायर कुछ अपीलें/रिवीजन याचिकाएं खारिज हुईं। इसके बाद कई पेंशनभोगियों ने आदेशों के अनुपालन को लेकर अवमानना प्रकरण भी दायर किए।
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हालांकि, पेंशन व्यवस्था को लेकर न्यायिक स्थिति पूरी तरह एकरूप नहीं है। उदाहरण के तौर पर, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मार्च 2026 के एक अलग मामले में सहायता प्राप्त स्कूलों के सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पेंशन संबंधी याचिकाएं खारिज करते हुए कहा था कि संबंधित मामले में पेंशनरी लाभ के लिए आवश्यक नियम मौजूद नहीं थे। यह फैसला सहायता प्राप्त स्कूलों से संबंधित था, इसलिए इसे अशासकीय सहायता प्राप्त महाविद्यालयों के मौजूदा विवाद का सीधे फैसला नहीं माना जा सकता।
जुलाई-अगस्त की पेंशन को लेकर भी सवाल
पेंशनभोगी संघ का आरोप है कि जुलाई और अगस्त 2026 की पेंशन का भुगतान भी नहीं किया गया है। संघ ने सरकार से दोनों महीनों की लंबित पेंशन का तत्काल भुगतान करने की मांग की है।
संघ के अनुसार, बड़ी संख्या में सेवानिवृत्त कर्मचारी उम्रदराज हैं और नियमित पेंशन उनके दैनिक खर्च तथा चिकित्सा आवश्यकताओं का प्रमुख आर्थिक सहारा है। इसी कारण पेंशन बंद होने से उनके सामने आर्थिक कठिनाइयां बढ़ने की बात संघ ने कही है।
मौजूदा कर्मचारियों की पेंशन-ग्रेच्युटी पर भी चिंता
संघ ने 11 सितंबर 2026 को जारी आदेश का हवाला देते हुए दावा किया कि वर्तमान में अनुदानित अशासकीय महाविद्यालयों में कार्यरत प्राध्यापकों और तृतीय-चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के लिए भी पेंशन एवं ग्रेच्युटी से जुड़े प्रावधान प्रभावित हुए हैं।
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संघ का कहना है कि इसका असर केवल वर्तमान पेंशनभोगियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वर्तमान कर्मचारियों की भविष्य की सेवानिवृत्ति सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।
सरकार का तर्क क्या है?
हालिया मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सरकार की ओर से 2010 के आदेश को समाप्त करने के पीछे यह तर्क सामने आया है कि संबंधित सेवा नियमों में इन विशेष पेंशन लाभों का स्पष्ट प्रावधान नहीं था और मंत्रिपरिषद ने इसे लोकहित के अनुरूप नहीं माना। सरकार ने इस विषय से जुड़े सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामलों में विधिक पैरवी जारी रखने का निर्णय भी लिया है।
वहीं, संघ का कहना है कि वर्षों से लाभ प्राप्त कर रहे सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पेंशन अचानक रोकना उनके लिए गंभीर आर्थिक संकट पैदा कर रहा है।
संघ की तीन प्रमुख मांगें
पेंशनभोगी संघ ने सरकार के सामने मुख्य रूप से तीन मांगें रखी हैं—
1 सितंबर और 11 सितंबर 2026 के आदेशों को वापस लेकर पेंशन एवं ग्रेच्युटी व्यवस्था बहाल की जाए।
जुलाई और अगस्त की लंबित पेंशन का शीघ्र भुगतान किया जाए।
न्यायालयों द्वारा दिए गए आदेशों के अनुरूप पात्र पेंशनभोगियों को उनके संबंधित वेतनमान के आधार पर पेंशन देने की व्यवस्था लागू की जाए।
संघ ने कहा कि उसने प्रदेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था के विकास में दशकों तक योगदान दिया है। अब सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन व्यवस्था में बदलाव से प्रभावित कर्मचारियों के सामने आर्थिक सुरक्षा का सवाल खड़ा हो गया है।
बड़ा सवाल यह है कि सरकार और पेंशनभोगियों के बीच इस विवाद का समाधान किस तरह निकलेगा और अदालतों में लंबित मामलों के बीच राज्य सरकार की नई नीति का अंतिम कानूनी प्रभाव क्या होगा।
प्रेसवार्ता में प्राध्यापकों ने बताया इस सन्दर्भ में मंत्री ओपी चौधरी, सांसद बृजमोहन अग्रवाल, विधायक सुनील सोनी, अमर पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल, सहित कई वरिष्ठ नेताओं से संपर्क साधा है. हालांकि अब तक कही से भी कोई आश्वासन नहीं मिला है.







