रायपुर। 9 अगस्त को Vishwa Adivasi Divas के अवसर पर रायपुर के इंडोर स्टेडियम में आदिवासी समाज का बड़ा आयोजन हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत बूढ़ा देव की पूजा-अर्चना और आदिवासी पुरखों को नमन के साथ हुई। इसके बाद निकली रैली सिटी कोतवाली होते हुए जयस्तंभ चौक पहुंची, जहां शहीद वीर नारायण सिंह के शहादत स्थल पर श्रद्धांजलि अर्पित की गई। रैली के वापस इंडोर स्टेडियम पहुंचने के बाद मुख्य अतिथियों और विभिन्न राज्यों से आए प्रतिनिधियों का स्वागत किया गया। आयोजन का केंद्र इस बार केवल सांस्कृतिक उत्सव नहीं रहा। आदिवासी धर्म कोड, आगामी जनगणना में धार्मिक पहचान, संविधान में मिले अधिकार, पांचवीं-छठी अनुसूची और PESA कानून जैसे मुद्दों पर राष्ट्रीय स्तर का परिसंवाद आयोजित किया गया। आयोजकों के अनुसार देशभर से करीब 5 हजार आदिवासी प्रतिनिधियों ने कार्यक्रम में भाग लिया।

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धर्म कोड को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर मंथन
राष्ट्रीय परिसंवाद में आदिवासी धर्म कोड को लेकर विस्तृत चर्चा हुई। प्रतिनिधियों ने धर्म कोड की संवैधानिक एवं वैधानिक प्रक्रिया, जनगणना में धार्मिक पहचान की प्रविष्टि और इसके संभावित सामाजिक, सांस्कृतिक तथा प्रशासनिक प्रभावों पर विचार रखा। वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को लेकर व्यापक जनजागरूकता जरूरी है। इसके लिए संगठनात्मक रणनीति बनाने और आगामी समय में सामूहिक रूप से मुद्दे को आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।

देव कुमार धान बोले- 9 अगस्त केवल उत्सव का दिन नहीं
झारखंड के पूर्व मंत्री देव कुमार धान ने कहा कि 9 अगस्त को केवल नाच-गाने तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने आदिवासी समाज की पहचान और अधिकारों से जुड़े सवालों को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाने की बात कही। उन्होंने केंद्र सरकार से 9 अगस्त को राष्ट्रीय आदिवासी दिवस घोषित करने की मांग रखी। उनके संबोधन में आदिवासी समाज के अधिकारों और सरकारी नीतियों को लेकर कई सवाल भी उठाए गए।

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सूर्य सिंह बेसरा ने UN घोषणा का किया उल्लेख
झारखंड के पूर्व विधायक सूर्य सिंह बेसरा ने आदिवासी अधिकारों से संबंधित संयुक्त राष्ट्र की घोषणा का उल्लेख करते हुए कहा कि आदिवासी समुदायों के अधिकारों, संस्कृति और पारंपरिक जीवन-पद्धति को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण प्रावधान मौजूद हैं। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य, सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक संसाधनों से जुड़े अधिकारों का उल्लेख करते हुए आदिवासी समाज को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने का आह्वान किया।

अरविंद नेताम ने संविधान और PESA पर उठाए सवाल
पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम ने अपने संबोधन में संविधान में आदिवासी समाज को दिए गए अधिकारों के वास्तविक क्रियान्वयन पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि संविधान के प्रावधानों को केवल पढ़ना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी लगातार समीक्षा और जमीनी स्तर पर प्रभाव का आकलन भी होना चाहिए। उन्होंने पांचवीं अनुसूची, छठी अनुसूची और PESA कानून का उल्लेख करते हुए ग्रामसभा की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार आदिवासी क्षेत्रों में विकास और उद्योग से जुड़े निर्णयों में स्थानीय समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित होना जरूरी है। कार्यक्रम में PESA के प्रावधानों और ग्रामसभा के अधिकारों को लेकर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने अनुसूचित क्षेत्रों में कानून के प्रभावी क्रियान्वयन की मांग उठाई।
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देशभर से पहुंचे आदिवासी प्रतिनिधि
कार्यक्रम में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, दिल्ली, ओडिशा, तेलंगाना, बिहार, पश्चिम बंगाल, गुजरात, झारखंड सहित कई राज्यों से प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों, प्रोफेसरों, विधि विशेषज्ञों और जनप्रतिनिधियों ने परिसंवाद में अपने विचार रखे। कार्यक्रम में भुवन कोर्राम, मधुकर उयके, डॉ. हीरा मीणा, करमा लकड़ा, विश्वनाथ वाकड़े, मनोहर मेश्राम, रेखा सोरेन, जनार्दन कोड़ा, प्रवेश वसावा सहित विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधि मौजूद रहे। विशिष्ट अतिथियों में अकबर राम कोर्राम, मंगतु राम पवार, हरवंश मिरी, रामेश्वर उरांव, रमेश यदु, लखन लाल साहू, लखन लाल कोशले, सुदीप श्रीवास्तव, जीआर राणा, जीआर चुरेंद्र, कमलेश धुर्वे, नकुल चंद्रवंशी, मोहन कोमरे, विनोद भगत, अकदा ठाकुर, विनोद नागवंशी, जयपाल ठाकुर, मनहरन चंद्रवंशी, शंकर कुंजाम, कैलाश नेताम, रुपेश नागरची, देवनाश नागरची, महेश रावटे, कमलेश मंडावी और जिवराखन लाल उसारे समेत कई पदाधिकारी एवं सामाजिक प्रतिनिधि शामिल रहे।

संस्कृति से आगे अधिकारों की लड़ाई
विश्व आदिवासी दिवस का आयोजन इस बार रायपुर में एक बड़े सामाजिक विमर्श का मंच बना। बूढ़ा देव की पूजा और शहीद वीर नारायण सिंह को श्रद्धांजलि से शुरू हुआ कार्यक्रम धर्म कोड और संवैधानिक अधिकारों की मांग तक पहुंचा। आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि 9 अगस्त केवल सांस्कृतिक पहचान प्रदर्शित करने का अवसर नहीं, बल्कि अधिकारों, सम्मान और संवैधानिक संरक्षण पर सवाल उठाने का दिन भी है। रायपुर के राष्ट्रीय परिसंवाद से यह संदेश सामने आया कि आने वाले समय में आदिवासी धर्म कोड, जनगणना में पहचान, ग्रामसभा के अधिकार और संविधान में मिले संरक्षण का प्रभावी क्रियान्वयन आदिवासी समाज के प्रमुख मुद्दों में शामिल रहेंगे।






