रायपुर। RAIPUR NEWS : छत्तीसगढ़ आरटीआई एक्टिविस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष संजय सिंह ठाकुर ने बताया कि राज्य के निजी विश्वविद्यालयों में पीएचडी सुपरवाइजर और को-सुपरवाइजर की नियुक्ति प्रक्रिया में लगातार अनियमितताएँ सामने आ रही हैं, जो उच्च शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं।
उन्होंने बताया कि कई निजी विश्वविद्यालयों में शोध मार्गदर्शन प्रणाली में विषय-संगतता, शैक्षणिक योग्यता और शोध अनुभव जैसे मूल मानकों की अनदेखी की जा रही है। नियमों के विपरीत ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां शोधार्थियों की अंतिम ओपन परीक्षा से ठीक पहले असंबंधित विषयों के शिक्षकों को को-सुपरवाइजर नियुक्त कर दिया जाता है।
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RAIPUR NEWS : संजय सिंह ठाकुर के अनुसार, इस तरह की नियुक्तियों का उद्देश्य शोध की गुणवत्ता बढ़ाना नहीं, बल्कि संबंधित शिक्षकों द्वारा पदोन्नति के लिए अपनी योग्यता सूची को मजबूत करना होता है। उन्होंने कहा कि इस प्रवृत्ति से शोध प्रक्रिया की निष्पक्षता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, और यह स्थिति धीरे-धीरे प्रदेश में सामान्य होती जा रही है।
उन्होंने यह भी बताया कि जब पीएचडी शोध को केवल औपचारिक प्रक्रिया तक सीमित कर दिया जाता है, तो उसका मूल उद्देश्य—ज्ञान-सृजन और समाज के विकास में योगदान—कमजोर पड़ जाता है। इसका सीधा नुकसान शोधार्थियों के शैक्षणिक भविष्य को होता है और समाज में शिक्षा व्यवस्था की साख भी प्रभावित होती है।
अध्यक्ष ठाकुर ने कहा कि ऐसी अनियमितताएँ ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ शिक्षकों तथा परिश्रमी शोधार्थियों के साथ अन्याय हैं, जो नियमों का पालन करते हुए उच्च अकादमिक मानकों को बनाए रखने का प्रयास करते हैं।
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RAIPUR NEWS : उन्होंने अपेक्षा जताई कि निजी विश्वविद्यालयों में पीएचडी मार्गदर्शन व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी और गुणवत्ता-आधारित बनाया जाए। साथ ही उन्होंने जनसमाज और शिक्षा मंत्रालय से अपील की कि उच्च शिक्षा की गुणवत्ता से जुड़े इन महत्वपूर्ण मुद्दों पर गंभीरता से ध्यान दिया जाए, सकारात्मक संवाद को बढ़ावा दिया जाए और अकादमिक मूल्यों की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।







