रायपुर। CRIME NEWS : राजधानी रायपुर में एक बार फिर यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या सच्चाई की खोज करना अब पत्रकारों के लिए खतरे से खाली नहीं रहा। फर्जी गौशाला से जुड़े कथित घोटाले की पड़ताल कर रहे एक युवा पत्रकार को रिपोर्ट प्रकाशित करने से पहले ही धमकाने, ब्लैकमेल करने और झूठे मुकदमों में फँसाने की कोशिश का गंभीर मामला सामने आया है।
मामला उस वक्त सामने आया जब यज्ञ सिंह ठाकुर, जो बेबाक संवाद न्यूज़ यूट्यूब चैनल के संचालक और दैनिक छगवॉच के नगर संवाददाता हैं, समाचार संकलन के सिलसिले में जुटे हुए थे। इसी दौरान उनके मोबाइल पर दुर्ग निवासी प्रभांक ठाकुर का फोन आया। कॉल करने वाले ने स्वयं को राधाकृष्णालय लोक न्यास ट्रस्ट का सचिव और पेशे से अधिवक्ता बताया।
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CRIME NEWS : आरोप है कि फोन कॉल के दौरान पत्रकार को साफ शब्दों में चेताया गया कि यदि ट्रस्ट या उससे जुड़े व्यक्तियों के खिलाफ कोई भी खबर प्रकाशित की गई, तो उन्हें झूठे आपराधिक मामलों में उलझा दिया जाएगा। कॉल में न केवल कानूनी दबाव बनाने की कोशिश की गई, बल्कि जान से मारने और अदालतों के चक्कर कटवाने की धमकी भी दी गई।
सूत्रों के मुताबिक पत्रकार को एक ऐसी कथित गौशाला की जानकारी मिली थी, जिसका संचालन संत अभिरामदास उर्फ अमनदत्त ठाकुर द्वारा किया जा रहा है और जिसके क्रियाकलापों पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। इसी संभावित खुलासे से पहले खबर को दबाने के उद्देश्य से यह दबाव बनाया गया, ताकि मामला सार्वजनिक न हो सके।

CRIME NEWS : लगातार मिल रही धमकियों से मानसिक रूप से परेशान होकर पत्रकार ने पुरानी बस्ती थाना में लिखित शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में मोबाइल कॉल का विवरण, आरोपी का नाम और धमकी की प्रकृति का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। मामले को सीएसपी पुरानी बस्ती ने संज्ञान में लेते हुए जांच का आश्वासन दिया है।
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अपनी शिकायत में पत्रकार ने यह भी उल्लेख किया है कि यदि भविष्य में उन्हें या उनके परिवार को किसी भी प्रकार की शारीरिक या मानसिक क्षति पहुँचती है, तो इसकी संपूर्ण जिम्मेदारी ट्रस्ट के सचिव और उससे जुड़े व्यक्तियों की होगी। उन्होंने निष्पक्ष जांच, दोषियों पर सख्त कार्रवाई और स्वयं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है।
यह घटना केवल एक पत्रकार की नहीं, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता पर बढ़ते दबाव की तस्वीर पेश करती है। सवाल यह नहीं है कि धमकी किसने दी, सवाल यह है कि सच्चाई उजागर करने की कीमत कब तक पत्रकार ही चुकाते रहेंगे?







